स्पर्श

वो हाथ मेरे सामने ही टेबल पर था जिसे ना जाने कब से मैं बस एक बार छूना चाहता था । मैं सच कह रहा हूँ , अगर उस वक्त भगवान मेरे आखरी साँस के बदले कोई साैदा करना चाहते तो मैं हँसते-हँसते उस साँस के बदले बस उसके उस हाथ को एक बार छू लेना स्वीकार कर लेता । मैं उसे छूना चाहता था , मैं उसे महसूस करना चाहता था पर मैं ये भी जानता था कि उसकी बस एक छूअन आैर मैं पागल सा हो जाऊँगा । मैं जानता था कि मैं उसकी उस छूअन को संभाल नहीं पाऊँगा , मैं फिर उससे कतरा भर भी दूर रह नहीं पाऊगा ।
उस दिन उसने मुझे ना कहने के लिए बुलाया था पर वो बस एक गलती कर गई । वो अनजाने में ही सही पर मुझे छू गई। बस फिर क्या था , मैं हो गया दिवाना। वो मिली नहीं मुझे , पर क्या फर्क पड़ता है । मेरे पास उसकी वो छूअन आज भी है। तुम्हें तो सब पता ही है , अब उसी छूअन को तुम मोहब्बत कहते हो ना , उसी छूअन को तुम मेरी कहानियाँ कहते हो ना ।

Advertisements

2 thoughts on “स्पर्श

Add yours

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

Create a website or blog at WordPress.com

Up ↑

%d bloggers like this: